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मिस्त्री की हाज़िरी का हिसाब

दिहाड़ी का हिसाब सामान के हिसाब से अलग है। सामान का बिल होता है, मज़दूरी का नहीं होता। यहाँ सबूत सिर्फ़ एक है — रोज़ लगी हुई हाज़िरी। यह पन्ना बताता है कि उसे कैसे रखें कि महीने के आख़िर में गिनती पर बहस न हो।

काम शुरू होने से पहले दर लिख लीजिए

ज़बानी तय की गई दर हफ़्ते भर में बदल जाती है — आपकी याद में कुछ और, उसकी याद में कुछ और। हर आदमी के नाम के आगे उसकी दिहाड़ी उसी दिन लिख लीजिए जिस दिन वह काम पर लगे।

राजमिस्त्री, बेलदार और सुपरवाइज़र की दर अलग होती है। एक ही "मज़दूरी" के नीचे सबको मत रखिए, वरना बाद में यह नहीं निकाल पाएँगे कि मिस्त्री पर कितना गया और बेलदार पर कितना।

हाज़िरी उसी शाम लगाइए

यह पूरे हिसाब की जड़ है। साइट छोड़ने से पहले हर आदमी के आगे उस दिन का निशान लगा दीजिए। चार में से एक:

दिन को हिस्से में गिनिए, घंटे में नहीं। घंटों का हिसाब साइट पर कोई नहीं रखता और हर आदमी की गिनती अलग निकलती है। "पूरा, आधा, ओवरटाइम" वह भाषा है जो मज़दूर और आप दोनों एक ही तरह समझते हैं।

नामदरपूरे दिनआधेओ.टी.बनतादियाबाक़ी
मंगल सिंह (राजमिस्त्री)8006016,0005,0001,000
रामू (बेलदार)5505103,0253,0250
सुरेश (बेलदार)5504002,2002,000200

मंगल सिंह का हिसाब: छह पूरे दिन और एक ओवरटाइम, यानी ६ + १.५ = ७.५ दिन, ८०० की दर से ₹6,000। यही गणित हर आदमी पर लगता है।

दर बढ़े तो पुराने दिन मत बदलिए

यह वह बारीक़ी है जो ज़्यादातर रजिस्टरों में छूट जाती है। मान लीजिए मंगल सिंह की दिहाड़ी आप तीन महीने बाद ८०० से बढ़ाकर ९०० कर देते हैं। अगर आपका हिसाब सिर्फ़ "दिनों की संख्या × आज की दर" पर चलता है, तो पिछले तीन महीने की मज़दूरी भी अपने आप बढ़ जाएगी — और आप बिना जाने ज़्यादा दे बैठेंगे।

सही तरीक़ा हर दिन के साथ उसी दिन की दर लिख दीजिए। दर आगे के लिए बदलिए, पीछे के लिए नहीं। जो दिन बीत गया, वह उसी दर पर जमा रहना चाहिए जिस पर वह काम हुआ था।

हफ़्ते या पंद्रह दिन पर मिलान कीजिए

दिहाड़ी वाले ज़्यादातर हफ़्तेवार या पंद्रह दिन पर पैसा लेते हैं। भुगतान के दिन दो संख्याएँ साथ चाहिए — बनता कितना है और अब तक दिया कितना है। इन दोनों का अंतर ही बाक़ी है।

अगर आप सिर्फ़ दिए हुए पैसे लिखते हैं और बनता हुआ नहीं, तो हिसाब कभी बंद नहीं होता। और अगर सिर्फ़ बनता हुआ लिखते हैं, तो बीच में दिए गए अग्रिम भूल जाते हैं।

जब गिनती पर बहस हो

यह होता ही है। मज़दूर कहता है चौबीस दिन, आपके रजिस्टर में इक्कीस हैं। दोनों में से कोई झूठ नहीं बोल रहा — दोनों याद से बोल रहे हैं, और याद तीन हफ़्ते बाद ग़लत होती है।

बचाव एक ही है: तारीख़वार हाज़िरी, जो उसी दिन लगी हो। जब आप तारीख़ों की सूची दिखाकर पूछते हैं कि किस दिन आए थे जो लिखा नहीं गया, तो बहस आम तौर पर वहीं ख़त्म हो जाती है। हफ़्ते बाद भरा गया रजिस्टर यह काम नहीं करता, क्योंकि वह भी आपकी याददाश्त ही है।

कुछ लोग हाज़िरी के साथ फ़ोटो भी रखते हैं। ज़्यादती नहीं है — जहाँ बीस-तीस मज़दूर हों और सुपरवाइज़र हाज़िरी लगा रहा हो, वहाँ यह अपने आप में एक जाँच है।

जब आप रोज़ साइट पर न हों

यही असली दिक़्क़त है। मकान बनवाने वाले ज़्यादातर लोग नौकरी भी करते हैं। हफ़्ते में दो बार जाना होता है, और हाज़िरी सुपरवाइज़र या ठेकेदार के भरोसे रहती है।

दो बातें ध्यान रखिए:

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कॉपी में हाज़िरी लगाना काफ़ी नहीं है क्या?

पूरी तरह काफ़ी है, बशर्ते आप रोज़ ख़ुद साइट पर हों और मज़दूर पाँच-सात हों। कॉपी तब कम पड़ती है जब गिनती और गुणा हर हफ़्ते दोबारा करना पड़े, या जब हाज़िरी कोई और लगा रहा हो और आपको वह उसी दिन दिखनी चाहिए।

ठेके पर काम करने वाले की हाज़िरी लगाऊँ?

नहीं। ठेके वाले का हिसाब दिनों से नहीं चलता, तय रकम से चलता है — कितना तय हुआ, कितना दिया, कितना बाक़ी। वह अलग हिसाब है, और उसका तरीक़ा ठेकेदार वाले पन्ने पर है।

मज़दूर को बीच में पैसे दे दिए तो कहाँ लिखूँ?

भुगतान की तरह लिखिए, हाज़िरी में मत छेड़िए। हाज़िरी बताती है कि कितना बनता है; भुगतान बताता है कि कितना दिया। दोनों अलग रहेंगे तभी बाक़ी सही निकलेगा।

त्योहार या बारिश के दिन क्या लिखें?

अगर काम नहीं हुआ और पैसा नहीं बनता, तो ग़ैरहाज़िर। अगर आपने काम न होने पर भी दिहाड़ी देने का तय किया है, तो पूरा दिन लगाइए — क्योंकि रकम बन रही है। रजिस्टर वही दिखाए जो असल में देना है।

Lagat में हाज़िरी

हर मज़दूर की दर, रोज़ की हाज़िरी, और बनता-दिया-बाक़ी अपने आप। जिस दिन की हाज़िरी लगती है उसी दिन की दर उसमें जमा हो जाती है, इसलिए दर बढ़ाने पर पुराना हिसाब नहीं बदलता। सुपरवाइज़र को अपने फ़ोन से सिर्फ़ अपने नीचे के मज़दूरों की हाज़िरी लगाने का हक़ दिया जा सकता है — बाक़ी साइट उसे नहीं दिखती।