Lagat › घर बनाने का खर्च कैसे लिखें
घर बनाने का खर्च कैसे लिखें
मकान आठ-दस महीने चलता है और उसमें दो-तीन सौ बार पैसा निकलता है। आख़िर में सवाल एक ही होता है — इतना पैसा गया कहाँ? यह पन्ना उसी का जवाब है: रोज़ क्या लिखें, कैसे लिखें, और किन दो-तीन ग़लतियों से पूरा हिसाब बेकार हो जाता है।
सबसे बड़ी बात: उसी दिन लिखिए
यह सलाह सुनने में मामूली लगती है, पर हिसाब यहीं बिगड़ता है। सुबह रेत की ट्रॉली आई, दोपहर में मिस्त्री को पाँच सौ दिए, शाम को सरिया वाले को कुछ अग्रिम दे दिया। अगले दिन तक आपको रकम तो याद रहेगी, पर भाव और मात्रा याद नहीं रहती — और असली हिसाब उन्हीं दो से बनता है।
दिन में दो मिनट लगते हैं। हफ़्ते में एक बार बैठकर याद करने में दो घंटे लगते हैं और आधा हिसाब फिर भी अंदाज़े का रह जाता है।
हर खर्च में यह सात चीज़ें लिखें
इससे कम लिखेंगे तो बाद में काम नहीं आएगा, और इससे ज़्यादा लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती:
- तारीख़ — जिस दिन सामान आया या पैसा दिया, वही तारीख़। बिल की तारीख़ नहीं।
- क्या लिया — सीमेंट, ईंट, वॉश रेत, सरिया। नाम वही रखिए जो आप हर बार लिखते हैं, बदलते मत रहिए।
- किससे लिया — दुकान या ठेकेदार का नाम। यही आगे चलकर सबसे काम आता है।
- भाव — एक बोरी, एक हज़ार ईंट, एक ट्रॉली का रेट।
- मात्रा — कितनी बोरी, कितनी ईंट, कितनी ट्रॉली।
- कुल रकम — भाव × मात्रा। जोड़कर लिखिए, ताकि बाद में जाँच सकें।
- कितना दिया, कितना बाक़ी — यह वह ख़ाना है जो लोग छोड़ देते हैं, और इसी की वजह से महीने के आख़िर में झगड़ा होता है।
एक बनी-बनाई मिसाल, जैसी असल में लिखी जाती है:
| तारीख़ | क्या | किससे | भाव | मात्रा | रकम | दिया | बाक़ी |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 31/08 | सीमेंट | शांता स्टील | 360 | 50 बोरी | 18,000 | 18,000 | 0 |
| 31/08 | ईंट | धर्मेंद्र | 10.50 | 10,000 | 1,05,000 | 50,000 | 55,000 |
| 31/08 | वॉश रेत | धर्मेंद्र | 37 | 800 फुट | 29,600 | 29,600 | 0 |
| 03/09 | मज़दूरी | भोला सिंह प्लंबर | — | — | 20,000 | 20,000 | 0 |
ध्यान दीजिए — धर्मेंद्र की दो प्रविष्टियाँ हैं, और उनमें से एक पर ₹55,000 बाक़ी है। यही वह संख्या है जो महीने के आख़िर में चाहिए होती है, और यही सबसे पहले खो जाती है।
सामग्री और मज़दूरी कभी एक साथ मत लिखिए
यह सबसे आम ग़लती है। मिस्त्री कहता है "बीस हज़ार दे दीजिए, सामान भी मैं ले आऊँगा" — और आप एक ही लाइन में बीस हज़ार लिख देते हैं।
छह महीने बाद जब आप देखेंगे कि मकान पर कुल कितना लगा, तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि उसमें से कितना ईंट-सीमेंट में गया और कितना मज़दूरी में। और अगली मंज़िल का अंदाज़ा लगाते समय यही दोनों आँकड़े अलग-अलग चाहिए होते हैं।
सिविल भाव पूछते समय यह ज़रूर पूछिए ठेकेदार जब "आठ सौ रुपये फुट" कहे, तो पूछिए कि इसमें सामग्री शामिल है या सिर्फ़ मज़दूरी। सिर्फ़ मज़दूरी का भाव दो-तीन सौ फुट होता है और सामग्री सहित दो हज़ार तक। दोनों को एक मान लेने पर बजट का अंदाज़ा कई गुना ग़लत बैठता है।
बिल की फ़ोटो उसी वक़्त ले लीजिए
पर्चियाँ जेब में फटती हैं, थर्मल प्रिंट की स्याही दो महीने में मिट जाती है, और साइट पर काग़ज़ भीगता है। जिस समय पैसा दे रहे हैं, उसी समय पर्ची की फ़ोटो ले लीजिए और उसे उसी खर्च के साथ रखिए — अलग गैलरी में नहीं, जहाँ बाद में ढूँढ़ना पड़े।
जब सप्लायर कहे कि आपने पैसा नहीं दिया, तो बहस का जवाब फ़ोटो होती है, याददाश्त नहीं।
छोटे नक़द खर्च ही हिसाब बिगाड़ते हैं
लोग सोचते हैं कि बड़ा हिसाब बड़ी रकमों से बिगड़ता है। होता उल्टा है। सरिया और सीमेंट के बड़े भुगतान सबको याद रहते हैं और उनके बिल भी होते हैं। जो नहीं लिखा जाता वह है — ढुलाई के तीन सौ, मज़दूरों की चाय, पानी का टैंकर, हार्डवेयर की छोटी ख़रीद, बिजली वाले को दिया अग्रिम।
अलग-अलग ये सब मामूली हैं। आठ महीने में जोड़िए तो अक्सर कुल लागत का आठ से दस प्रतिशत निकलते हैं — और यही वह रकम है जिसका आख़िर में कोई हिसाब नहीं होता।
कॉपी, एक्सेल या ऐप — किसमें लिखें
तीनों से काम चलता है। सही चुनाव इस पर निर्भर करता है कि आपकी असल दिक़्क़त क्या है।
कॉपी या रजिस्टर
अगर आप रोज़ ख़ुद साइट पर हैं, पार्टियाँ चार-पाँच हैं, और ज़्यादातर नक़द चलता है — कॉपी ठीक है। सस्ती है, बैटरी नहीं माँगती, और किसी को सिखानी नहीं पड़ती। दिक़्क़त एक ही है: जोड़ हर बार दोबारा करना पड़ता है। "धर्मेंद्र का कितना बाक़ी है" जानने के लिए आपको आठ महीने के पन्ने पलटने पड़ेंगे।
एक्सेल
जोड़ अपने आप हो जाता है और छाँटना आसान है। पर एक्सेल फ़ोन पर भरना तकलीफ़देह है, और खर्च साइट पर होता है, मेज़ पर नहीं। नतीजा यह होता है कि लोग हफ़्ते भर की पर्चियाँ जमा करके रविवार को भरते हैं — और तब तक भाव-मात्रा वाली बात लागू हो चुकी होती है।
ऐप
फ़ायदा तब है जब आपको पार्टी का चलता हुआ बाक़ी चाहिए, बिल की फ़ोटो साथ चाहिए, या घर का कोई और सदस्य भी खर्च जोड़ता है। अगर आपकी ज़रूरत सिर्फ़ "कुल कितना लगा" है, तो कॉपी से भी चल जाएगा — इसके लिए कुछ इंस्टॉल करने की ज़रूरत नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
उधार लिया सामान कैसे लिखें?
जिस दिन सामान आया उसी दिन पूरी रकम दर्ज कीजिए और "दिया" में शून्य रखिए। इससे पूरी रकम उस पार्टी के बाक़ी में चली जाती है। बाद में जो चुकाएँ उसे अलग भुगतान की तरह लिखिए। सामान आने के दिन कुछ न लिखना सबसे बड़ी भूल है — वह लेनदारी कहीं दर्ज ही नहीं होती।
एक ही दिन एक ही पार्टी से दो बार सामान आया तो?
दो अलग प्रविष्टियाँ बनाइए। एक में जोड़ देने से भाव ग़लत हो जाता है, और अगली बार भाव की तुलना करने पर आँकड़ा काम नहीं आता।
पुराना हिसाब जो कॉपी में है, उसका क्या करें?
पीछे का सारा हिसाब दोबारा भरने की ज़रूरत नहीं। हर पार्टी का सिर्फ़ आज का बाक़ी एक-एक प्रविष्टि में डाल दीजिए और आगे का रोज़ लिखिए। पीछे की तारीख़ें कॉपी में ही रहने दीजिए।
क्या ज़मीन और रजिस्ट्री का खर्च भी इसी में लिखें?
हाँ, पर अलग श्रेणी में — क़ानूनी खर्च या ज़मीन। निर्माण की लागत प्रति फुट निकालते समय ये अलग रखने पड़ते हैं, वरना भाव असल से बहुत ऊँचा दिखता है।
Lagat से यही काम
यह ऐप ठीक इसी तरीक़े पर बना है — तारीख़, सामान, पार्टी, भाव, मात्रा, और दिया-बाक़ी। हर पार्टी का बाक़ी अपने आप चलता है, बिल की फ़ोटो प्रविष्टि से जुड़ी रहती है, और बिना इंटरनेट के भी चलता है, क्योंकि साइट पर नेटवर्क नहीं होता। एक व्यक्ति के लिए हमेशा मुफ़्त।